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 लेख

नकली आधुनिकता का शिकार उराँव आदिवासी


लेखकः मनोहर तिर्की, राँची

                                 

 

1. कुँड़ुख़ भाषा व लोक-संस्कृति विलुप्ति की ओर

समय के साथ-साथ लोगों के जीवन शैली में भी परिवर्तन होता रहता है। उराँव समुदाय भी इससे अछुता नहीं है। पहले और आज के परिप्रेक्ष्य में देखा जाय तो इनमें व्यापक परिवर्तन आया है। शिक्षा के क्षेत्र में इस समुदाय के लोग आगे बढ़ रहे हैं। वे शिक्षा के महत्व को समझने लगे हैं। इस समुदाय पर बाहरी संस्कृति का भी गहरा असर पड़ा है। आज उरांव लोग हर क्षेत्र में आगे आ रहे हैं, लेकिन अपनी परम्परा एवं संस्कृति से कटते जा रहे हैं। पढ़ा-लिखा तबका तो भाषा-संस्कृति, परम्परा से विमुख सा हो गया है। वहीं गांवों में भी अपनी भाषा-संस्कृति एवं परम्परा के प्रति गहरी रूचि नहीं दिखायी देती है। इसके कई कारण है। इनमें धुमकुड़िया का क्षरण होना, शिक्षा-व्यवस्था में आदिवासी भाषा और संस्कृति को सही जगह नहीं देना, लोक कलाकारों को उचित सम्मान न देना, नकली आधुनिकता का गहरा प्रभाव, कैसेट कल्चर का हावी होना, शहरी क्षेत्रों में हिन्दुओं के साथ घुलने-मिलने की सहज प्रवृति व उनके धार्मिक रीति-रिवाजों का अनुसरण, इसाई उराँव आदिवासियों में लोकाचार की समझ की कमी, सादरी का जबरदस्त प्रभाव होना शामिल है।

धुमकुड़िया प्रथा उरांव समुदाय में प्रचलित थी, जो अब समाप्त सी हो गयी है। यह सांस्कृतिक, सामाजिक एकता और सामूहिकता का प्रशिक्षण केन्द्र हुआ करता था। धुमकुड़ियां में आदिवासी लोकाचार का प्रशिक्षण दिया जाता है। धुमकुड़िया प्रचलन समाप्त होने के कगार पर है। जिसके कारण उरांव समुदाय के लोग अपनी राग-रागिनी, ताल, लोकनृत्य भूलते जा रहे हैं। जीवन का मूल्य नहीं समझ पा रहे हैं। सामाजिक और सांस्कृतिक बिखराव आने लगा है। इधर कुछ वर्षों से धुमकुड़िया को पुनर्जीवित करने का सार्थक प्रयास किया जा रहा है। सिसई से उत्तर तीन किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित गाँव सैंदा में इसकी शुरूआत की गयी है। यहां बच्चों को शिक्षा दी जाती है। गांव सैंदा के अतिरिक्त टुकु सैंदा, बधनी, पबेया, अताकोरा लेटंगाटोली, तेतरटोली, बांसटोली, सियांग, लवागाई चेंगरी, शिवनाथ डउहटोली, काड़ेदाम आदि गांवों में धुमकुड़िया को पुन:स्थापित किया जा सका है। संस्कृति परम्परा के विलुप्त होने का एक कारण है धुमकुड़िया के साथ अखड़ा संस्कृति का समाप्त होना। अब अखड़ा में गायन-नृत्य नहीं के बराबर होता है। इसे समाप्त करने में आधुनिक शिक्षा-व्यवस्था का भी योगदान है।

सामूहिकता का प्रचलन उरांव समुदाय की सबसे बड़ी विशेषता है, अब वह भी लोप होने लगा है। एकल परिवार की प्रथा अग्रसर हो रहा है। मदइत भावना के कारण उराँव समाज के लोग कृषि कार्यों तथा अन्य बड़े कार्यों में एक दूसरे की मदद किया करते हैं। मदइत में किये गये कार्यों के बदले में मजदूरी नहीं ली जाती है। सिर्फ मदइत लेने वाला व्यक्ति अपनी स्वेच्छा से खानपान की व्यवस्था कर देता है रोआ इदना(धान लगाना) इसका उदाहरण है, जिसमें पुरूष खेतों की जुताई और बिचड़ों को खेतों में डालता है, और महिलाएँ तैयार खेतों में धान लगाती है। मदइत की भावना अब समाप्त हो रही है।

ईसाई उरांव आदिवासियों के बीच शादी विवाह और पर्व त्यौहारों में आदिवासी गीत-संगीत, नृत्य और लोकाचार की झलक साफ दिखाई देती थी। गिरजा घरों में गाया जाने वाला कुँड़ुख़ डण्डी इसका सटीक उदाहरण है। कुँड़ुख़ डण्डी में कुँड़ुख़ रागों का भरपूर इस्तेमाल किया गया है। बेंजा डण्डी व नृत्य आदिवासी लोकाचार को प्रदर्शित करती है। परन्तु अब यह देहातों में ही सिमट कर रह गया है। डण्डा ख़ेर्रना, लोटापानी, कोहा पाही, डली फरियआना, पचाइट, मदाइत आदि आदिवासी लोकाचार के प्रमाण हैं, जो अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। परन्तु फिर भी आदिवासी लोकाचार की स्पष्ट झलक देहातों में अब तक दिखाई देती है। वाद्य यंत्रों में ढोलक, मांदर, नगाड़े और बांसुरी के प्रचलन को कायम रखना अति आवश्यक है। आजकल धर्मा-चार और आधुनिकता की शान में लोकाचार के प्रति उदासीनता चरम पर है। सच कहा जाये तो ईसाई उराँव आदिवासी लोकाचार को अब तक पूरी रीति से समझ ही नहीं पाये। बाद में खासकर कैथोलिक पुरोहितों ने 1960 के बाद इसे समझने की कोशिश की, फलस्वरूप करम एवं सरहुल मनाने की परम्परा शुरू की गयी। परन्तु 11 अक्टूबर 2008 में राजी पड़हा सरना प्रार्थना सभा और ऑल चर्चेज कमिटि के प्रतिनिधियों के बीच अहम समझौता के तहत् चर्च में करम और सरहुल पूजा का धार्मिक अनुष्ठान नहीं करने तथा केवल पहान की अगुवाई में परंपरागत रीति से निहित मुहुर्त में अखड़ा/सरना में करम/सरहुल मनाने का निर्णय लिया गया।

पाठ्यक्रमों तथा सरकारी क्रियाओं में उराँव भाषा और संस्कृति को उचित जगह नहीं मिलने से उनके बच्चे अपनी भाषा संस्कृतिक से कटते जा रहे हैं। 1970-71 में गोस्सनर कॉलेज में डा. निर्मल मिंज ने कुड़ुख के साथ अन्य झारखंडी भाषाओं की पढ़ाई शुरू करायी। 1981 में राँची विश्वविद्यालय में जनजातीय व क्षेत्रीय भाषा विभाग की स्थापना हुई। डॉ. रामदयाल मुंडा एवं अन्य बुद्धिजीवियों के अथक प्रयास से राँची विश्वविद्यालय के जनजातीय व क्षेत्रीय भाषा विभाग में कुँड़ुख़ भाषा की पढ़ाई शुरू हुई। यहाँ कुँड़ुख़ भाषा के साथ पाँच जनजातीय भाषाएँ और चार क्षेत्रीय भाषाओं की पढ़ाई हो रही है। लेकिन शिक्षकों और उत्कृष्ट पाठ्य पुस्तकों की कमी के कारण छात्रों की रूचि में बढ़ोतरी नहीं हो पा रही है। झारखण्ड, छत्तीसगढ़ और उड़िसा सरकार प्राइमरी और माध्यमिक विद्यालयों में कुँड़ुख़ व अन्य जनजातीय भाषाओं में पढ़ाई की आवश्यकता महसूस करती रही है, लेकिन विशेष पहल और दृढ़ इच्छा शक्ति के अभाव में अब तक इसे लागू नहीं किया जा सका। सरकारी दफ्तरों, स्कूल कलेजों की परीक्षाओँ तथा प्रतियोगी परीक्षाओं में उराँव भाषा को लागू करने की चर्चा होती है, परन्तु यह बहुत दूर की बात है।

लोक कलाकारों और लेखकों को उचित सम्मान नहीं मिलने से भी लोक नृत्य के प्रति युवाओं का रूझान कम होता जा रहा है। लोक नृत्य और कला को विकसित करने के लिए सरकार द्वारा विभिन्न सांस्कृतिक आयोजन ओर पुरस्कारों की व्यवस्था करना चाहिए था। परन्तु सरकार अब तक इस ओर कोई ठोस कदम नहीं उठाया। सरकार द्वारा उराँव भाषा में उत्कृष्ट कार्य करने वाले व्यक्तियों और नन-सरकारी संस्थाओं को मदद करने के साथ-साथ उचित सम्मान व पुरस्कार मिलना चाहिए, तभी उन्हें प्रोत्साहन मिलेगा।

अपनी भाषा से विमुख होना भी लोक नृत्य की विलुप्ति का एक कारण है। उराँव, मुंडा, हो और संथाली भाषा में उराँव भाषा का गिरावट सबसे ज्यादा है। संथाली भाषा तो राष्ट्रीय स्तर पर अपना पहचान बना चुका है। उराँव समुदाय के बहुत से लोग उरांव भाषा न बोलकर सादरी या मुंडारी बोलते हैं। उनपर सादरी का तो जबरदस्त प्रभाव है। कुछ उरांव गांव तो ऐसे हैं जहां लोग कुड़ुख जानते ही नहीं। जानते भी हैं तो बोलते नहीं। जब भाषा ही नहीं जानेंगे तो फिर गायन-वादन या नृत्य कैसे होगा? ऐसे में अपनी भाषा-संस्कृति से जुड़े रहना मुश्किल है। सिसई प्रखण्ड के बहुत से गांव हैं जहां के उरांव सादरी भाषा का ही प्रयोग करते हैं। इनमें नगर, विश्रामपुर, नागफेनी, लावागाई, बिरकेरा, अड़ियाटोली, पंडरिया, बरगांव, घूमाटोली, सेमरा, सियान, पंडरानी, बबनी, पोड़हा, समल जोरगोटोली आदि, इसी तरह मांडर प्रखण्ड के करगे, तिगोई, अम्बाटोली, चान्हों प्रखण्ड के हर्रा आदि गांवों में सादरी ज्यादा बोली जाती है। वहीं रांची जिले के रांची से सटे काफी उरांव गांव के लोग मुंडारी बोलते हैं।

      आजकल अधिकांश शिक्षित उराँव परिवार में हिन्दी अथवा सादरी भाषा का इस्तेमाल किया जाता है। जिसके कारण बच्चे शुरू से उराँव भाषा नहीं समझते हैं। तमिल, मराठी, बंगाली, उड़िया और उत्तर पूर्व के लोग इस मामले में बहुत सजग जान पड़ते हैं। क्योंकि वे घरों में अपनी मातृभाषा का ही इस्तेमाल करते हैं। आरक्षण के बल पर नौकरी में आये उराँव आदिवासी स्वंय को बहुत उच्च मानने लगता है। कुँड़ुख़ बोलने से वह स्वंय को तौहीन समझने लगता है। शहरों में दो उराँव की मुलाकात होने पर हिन्दी अथवा सादरी में बातचीत शुरू हो जाती है। कभी-कभी दो जन कुँड़ुख़ में बातचीत कर रहे होते हैं उसी बीच कोई तीसरा गैर उराँव पहुँच जाता है तो उनकी भाषा बदल जाती है। ऐसा करके वे स्वंय को हकीकत से छिपाना चाहते हैं।

नागपूरी और फिल्मी गीतों का कल्चर उराँव समुदाय की बीच हावी हो रहा है। इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि समय के साथ उरांव समुदाय नकली आधुनिकता को अपनाने लगा। नागपुरी और फिल्मी गीतों का कैसेट कल्चर हावी होने लगा। आज स्थिति यह है कि उरांव समुदाय ने इसे अपनी संस्कृति का एक अभिन्न अंग बना लिया है। कोई भी पर्व त्योहार या अन्य कार्यक्रमों में आधुनिक नागपुरी गीतों को अवश्य बजाया जाता है। पर्व-त्यौहारों एवं अन्य अवसरों पर नागपुरी गीतों की ताल पर लोगों को थिरकते व मूक-नृत्य करते हुए आसानी से देखा जा सकता है। भले ही लोक नृत्य, वादन हो या न हों। आज हर उरांव परिवार में नागपुरी कैसेट कल्चर ने अपनी जगह बना ली है। इस तरह कहा जा सकता है कि नागपुरी गीतों के कैसेट कल्चर ने उरांव सांस्कृतिक परम्परा पर व्यापक प्रहार किया है।

      इस प्रकार उरांव समुदाय में कई कारणों से व्यापक परिवर्तन आया है। इस परिवर्तन में लोक-संस्कृति का विलुप्त होना चिंता का विषय है। यह समुदाय हवा के झोंकों के साथ बहता चला जाता है। कट्टरवादिता नहीं दिखाई देती है। दूसरे की संस्कृति के साथ अपने को बहुत जल्दी ढाल लेते हैं। यह कुछ हद तक ठीक है- समाज के लिए चिंता करने वाले लेखकों-चिंतकों का कहना है कि समय के साथ बदलाव आवश्यक और जरूरी है लेकिन सामाजिक मूल्य और अपनी पहचान को बचाकर ही हम बदलाव की ओर बढ़ सकते हैं। धुमकुड़ियां सामाजिक मूल्य का प्रशिक्षण केन्द्र हैं जहाँ आदिवासी लोकाचार का प्रशिक्षण दिया जाता है। धुमकुड़िया प्रचलन समाप्त होने के कगार पर है। जिसके कारण उरांव समुदाय के लोग अपनी राग-रागिनी, ताल, लोकनृत्य भूलते जा रहे हैं। जीवन का मूल्य नहीं समझ पा रहे हैं। सामाजिक और सांस्कृतिक बिखराव आने लगा है। धुमकुड़िया परम्परा को जीवित करने की जरूरत है।

 

     

2. विलुप्ति की ओर बढ़ता उरांव लोकनृत्य

उरांव जनजाति झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़िसा और पश्चिमी बंगाल में पाये जाने वाली प्रमुख जनजातियों में से एक है। इस समुदाय की अपनी विशेषताएं हैं। ये रोहतास गढ़ से दक्षिणी छोटानागपुर में आकर बसे फिर यहीं के होकर रह गये। कुड़ुख भाषा बोलने वाले इस समुदाय की जीवन-शैली अपने आप में विशिष्ट है। इनकी जीवन-शैली में लोकनृत्य का महत्वपूर्ण स्थान है लेकिन आज समय और परिस्थितियां बदली है। कभी ये
प्रदेश पूरी तरह वनों से आच्छादित था। ऐसे में स्वाभाविक रूप से उस समय जो नृत्य-शैली विकसित हुई उसका वृक्षों से गहरा संबंध था।

      कुछ आदिवासी समुदाय, जैसे संथाल समुदाय, जिसमें अनेक ऐसे नृत्य पाये जाते हैं जिसमें सिर्फ पुरूष ही भाग ले सकते हैं; परन्तु उराँव समुदाय में सिर्फ पाँकी नृत्य को छोड़कर प्रायः सभी नृत्य में स्त्री-पुरूष समान रूप से भाग ले सकते हैं। पाँकी नृत्य में पुरूष चँवार दोनों हाथों में लहराते हुए नाचते हैं। उराँव समुदाय के लोग शादी-विवाह, पर्व-त्यौहार, पूजा-पाठ तथा फसल लगाने और काटने से लेकर शिकार करने आदि अवसरों पर सामुहिक रूप से नृत्य करते हैं। इनका लय, भाव-भंगिमा, आंगिक चेष्टा तथा इनकी गति का प्रवाह भी भिन्न-भिन्न हैं। उराँव समुदाय के लोग जीवन की जड़ता, खिन्नता दूर करने, चित्तवृत्तियों को उल्लासित करने तथा तन की थकान मिटाने के लिए गीत-नृत्य का सहारा लेते हैं।

प्रतिकूल प्रभाव आज का नजारा बिल्कुल अलग है। जंगल सिमट रहे हैं। शिक्षा का प्रचार-प्रसार हुआ है। बाहरी दुनिया का दबाव बढ़ा है। आदिवासी समुदाय को यातायात के साधनों, कम्प्यूटर, इंटरनेट आदि ने बाहरी दुनिया से सीधे जोड़ दिया है। लोगों के जनजीवन पर भी पाश्चात्य सभ्यता हावी हुई है। आज का शिक्षित वर्ग अपनी भाषा, लोक कथा, संस्कृति से विमुख हुआ है। एकल परिवार को बल मिला है। आज का शिक्षित वर्ग अपनी भाषा, लोक कथा, संस्कृति से विमुख हुआ है। एकल परिवार को बल मिला है। इससे लोकनृत्य पर प्रतिकूल असर पड़ा है। सामूहिकता उरांव जनजाति की सबसे बड़ी विशेषता रही है। लेकिन अब यह विशिष्टता क्रमश: विलुप्त हो रही है, इसी सामूहिकता से ही जुड़ा हुआ है उरांव लोकनृत्य। उरांव समुदाय में सामूहिक नृत्य होता है। सामूहिकता इनकी पहचान है। खेती-बारी के कार्य में मदइत की शुरुआत इसी से हुई। सामूहिकता के विलुप्त होने से सामाजिक संगठन भी कमजोर हुआ है। धुमकुड़िया के क्षरण होने से अखड़ा संस्कृति समाप्त सी हो गयी है। इससे गायन, नृत्य और वादन की परम्परा खत्म हो रही है। समरसता और एकता में बिखराव आने लगा है।

मौसम आधारित उरांव समुदाय में मौसम आधारित गीत विशेष रूप से गाये जाते हैं। राग-रागिनी मौसम, समय और पर्व-त्योहार के अनुकूल होती है। ताल भी बदलता रहता है। कहावत है बारो मासे बारो राग। गीत और नृत्य एक साथ चलते हैं। इसलिए जितने गीत, राग-रागिनी उतनी नृत्य शैली भी है। इस समुदाय में बेमौसम वाला गीत-नृत्य करना एकदम मना है। मौसम समय या पर्व-त्योहार को नजर अंदाज करके न कोई गीत गाया जाता है, न बजाया जाता और न ही नृत्य किया जाता है। मौसम विशेष से जुड़े ऋतु-पर्वों एवं अन्य अवसरों जैसे सुहरय, फग्गु, सरहुल, करम और जलसा आदि पर नाचने-गाने की परम्परा है।

उरांव लोकनृत्य में मुख्यत: सरहुल (खद्दी), करमा, जेठ जतरा, डमकच, अँगनाई, भेजा, बरोया, घुड़िया, असारी, सावनी, जरगा, कार्तिक, जतरा, मठा, शादी, जदुरा, ठड़ लहसुवा, लहसुवा, बोंगाठी, दुंदु, पॉकी, झुमर, जेजुटी, बदरी, ईटु, जलसा आदि नृत्य शामिल हैं।

सरहुल लोकनृत्य जिसे उरांव लोग खद्दी कहते हैं, फागुन के बाद बैशाख पूर्णिमा तक किसी भी दिन जब साल वृक्ष में फूल मौजूद होते हैं, मनाई जाती है। सरहुल पर्व अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग दिन मनाया जाता है। कुछ दशकों से रांची में संगठित रूप से चैट तृतीय को सरहुल पर्व मनाने का रिवाज चल पड़ा है। सरहुल उराँव समुदाय का प्रमुख त्यौहार है, जिसमें नृत्य न हो ये कैसे हो सकता है? युवक-युवतियाँ साल फूल से अच्छी तरह से सजे होते हैं, उनके मटमैली चेहरों और काली बालों के बाच में यह क्रिम-सफेद रंग वाली फूल बहुत सुन्दर दिखाई देते हैं। सरहुल नृत्य भी अखाड़े में रात भर चलती है। इस नृत्य में भी युवतियाँ गोल आकृति बनाते हुए नृत्य करती हैं और नगाड़ा और मांदर मुख्य वाद्य यंत्र होते हैं। इसके अतिरिक्त ढोलक और घंटा का इस्तेमाल भी होता है। नृत्य के साथ-साथ गीत भी गाया जाता है। वाद्य वादक लोग नाचने वाली गोल आकृति के बीच में रहते हुए बजाते है और नाचते हैं। पुरूष सफेद धोती अथवा लूँगी और महिलाएँ सफेद साड़ी पहनती हैं, दोनों वर्ग के पोशाक में लाल पाड़ होते हैं। नृत्य के दौरान गाँव के बुजुर्ग माता-पिता तथा अन्य लोग अखाड़े के बाहर इमली पेड़ अथवा किसी अन्य पेड़ के नीचे खड़े होकर दृश्यानांद करते हैं।

जेठ जतरा सरहुल पर्व के बाद मनाया जाता है। यह जेठ तक रहता है।

बरोया सबसे रसिका नृत्य माना जाता है। यह नृत्य सालोभर किया जाता है लेकिन मुख्यत: सरहुल और जेठ जतरा के दौरान यह नृत्य किया जाता है।

घुड़िया जेठ जतरा बीतने के बाद असार (आषाढ़) तक घुड़िया नृत्य किया जाता है। यह नृत्य लचक-लचक कर किया जाता है।

असारी आषाढ़ चढ़ते ही असारी नृत्य शुरू होता है।

सावनिया नृत्य सावन महीने में किया जाता है।

करमा नृत्य भादो-कुवर महीने में किया जाता है। भादो एकादमी को करम पर्व मनाया जाता है। इसी दिन से करमा नृत्य शुरू होता है। यह काफी लोकप्रिय लोकनृत्य है। कर्मा त्यौहार की रात युवक-युवतियों का एक समूह रात भर गीत और नृत्य करती हैं। इस अवसर पर गाये जाने वाले गीतों में करमा और धर्मा की कहानियों का समावेश होता है। करम वृक्ष की एक शाखा को अखाड़े के बीच में गाड़ दिया जाता है, और रात भर इसके चारो ओर नाच-गान की जाती है। युवतियों के बालों में जवा फूल, रंगीन फीता और श्रंगार की सामग्रियाँ सजी होती हैं। पहनने के लिए विशेष प्रकार की साड़ियाँ, जिसमें तीन धार वाली पाड़ होती हैं। युवक लोग युवतियों के गोलाकार कतार के मध्य बाद्य यंत्रों के साथ नृत्य करते हैं। जिनके पास वाद्य यंत्र नहीं होते, वे युवतियों की तरह अपने-अपने हाथों के सहारे जुड़कर और गोल आकृति बनाते हुए नृत्य करते हैं। नाचने के दौरान बीच-बाच में हुर्ररररर.....की आवाज करते हुए हँसते और ठहाके मारते हैं। यह नृत्य सुर्योंदय होने के कुछ देर बाद तक चलती रहती है।

जरगा नृत्य को चुलु भी कहा जाता है। मठा गीत का मौसम समाप्त होते ही जरगा गीत-नृत्य का दौर शुरू होता है।

कार्तिक जतरा नृत्य जेठ जतरा के बाद कार्तिक महीने में किया जाता है। इस समय कार्तिक जतरा, डुम्बु जतरा, पड़हा जतरा, सोहराई जतरा, देव उठान जतरा, माघ जतरा नृत्य किया जाता है। झारखंड का ऐतिहासिक मुड़मा जतरा भी इसी समय होता है। जतरा नृत्य उराँव समुदाय का एक प्रसिद्ध नृत्य है। यह नृत्य हर वर्ष गाँव के किसी मैदान अथवा आम के बगीचों में आयोजित की जाती है। प्रायः आनांद से भरा इस नृत्य को कई गाँव के लोग मिलकर आयोजित करते हैं। सभी गाँव के रंग-बिरंगे झण्डों को इकट्ठा कर लिया जाता है, उसके बाद चतरा मैदान के रास्ते तथा मैदान के चारो ओर कताबद्ध तरीके से झण्डों को गाड़ दिया जाता है। रंग-बिरंगे झण्डे गांव के युवक-युवतियों को नृत्य की ओर आकर्षित करती है; दर्शकों को भी जतरा की ओर खींचने में मदद करती है। गाँव के युवक-युवतियाँ सुबह अपने-अपने कार्यों को जल्दी खत्म करके अपने-अपने नृत्य पोशाकों और वाद्य यंत्रों के साथ दोपहर को जतरा मैदान में अपने-अपने गांवों से कतार बनाकर पहुँचना शुरू कर देते हैं। जतरा मैदान में सभी गाँवों से आने वाली समूह का अपना-अपना नृत्य मण्डली होती है, जिसके कारण अलग-अलग नृत्य समूह देखे जा सकते हैं। शहनाई की आवाज, ढोलक, नगाड़े ओर मांदर की थाप से नृत्यंगनाओं की पैर थिरकने लगती है। यवकों के हाथों में तलवार, सुरक्षा कवज और अन्य बनावटी हथियार होते हैं जिसे वे लहराते हुए नाचते हैं। कुछ युवक कृत्रिम घोड़ों व हाथियों में स्वार होकर बीच में नृत्य करते हैं। उनके घोड़े और हाथियों को सुन्दर कपड़ो और कागजों से सजाया जाता है। युवकों के कमर और पैरों पर बड़े-बड़े घुँघरू खनकते रहते हैं। शहनाई और घंटे की आवाज भी जतरा में देखी जा सकती है। युवतियाँ कतारों में एक दूसरे के हाथों से जुड़कर तथा गोल आकृति बनाते हुए नृत्य करते हैं। युवतियों के बालों में सजावट के फूल, कागज और श्रृंगार के साधन मौजुद होते हैं। उनके शरीर में एक समान रंग की साड़ियाँ और बलाउज होती हैं। पैरों में बालाएँ तथा घुँघरू और हाथों में रंगीन चूड़ियाँ युवतियों की सुन्दरता पर चार चाँद लगा देते हैं। युवतियाँ नाचते समय ताल और लय के अनुसार पैरों को उठाती और गिराती हैं, आगे और पीछे एक साथ होती हैं। अनुशासन इस नृत्य की अद्भूत विशेषता है। जतरा नृत्य के समय चारो ओर रोमंच और आनान्द से भरा माहौल होता है। दर्शक लोगों का हुजुम सा पूरे मैदान में लगा रहता है। जतरा नृत्य सूर्यास्त तक चलती है, उसके बाद नृत्य मण्डलियाँ अपने अपने गाँव की ओर नृत्य करते हुए वापस चले जाते हैं।

मठा गीत नृत्य करमा विसर्जन के तुरन्त बाद शुरू होता है। शादी का मौसम करमा पर्व के बाद शुरू हो जाता है। भादी राग में गीत नृत्य जाड़े के मौसम से शुरू किया जाता है।

भादो नृत्य शादी के समय किया जाता है।

जदुरा नृत्य पूस-माघ में जदुरा उरांव समुदाय के द्वारा की जाती हैं। रात में किया जाने वाला इस नृत्य की शैली काफी आकर्षक होती है।

लहसुवा और ठइ लहसुवा नृत्य सरहुल और करमा पर्व के दौरान ही किया जाता है।

बोंगाठी और पइका नृत्य शादी-विवाह के समय का आकर्षक नृत्य है।

नटुआ नाच भी शादी के मौसम में किया जाता है।

दुंदु नृत्य सोहराई पर्व का नृत्य है। यह नृत्य रूप, वेश-भूषा बदलकर किया जाता है।

पाँकी नृत्य पुरूषों के द्वारा हाथों में चँवार लेकर यह नृत्य की जाती है।

अँगनाई नृत्य यह नृत्य किसी भी त्यौहार के अवसर पर उराँव समुदाय के द्वारा की जाती है।

डोमकच नृत्य यह श्रृंखलाबद्ध नृत्य की शैली है। यह झारखण्ड में सदानों के द्वारा मुख्य रूप से की जाती है। उराँव समुदाय के द्वारा भी इस नृत्य को अपनायी गयी है।

भेजा नृत्य दर्जनों युवक-युवतियाँ एक निश्चित जगह पर एकत्रित होकर तथा एक दूसरे के होथों से कतारों में जुड़कर नृत्य करते हैं। नृत्य के दौरान कई प्रकार का नृत्य की जाती है, और नृत्य के दौरान पारंपरिक गीतों और वाद्य-यंत्रों का उपयोग किया जाता है।

जलसा नृत्य उराँव समुदाय में इसाई धर्म पर आस्था रखने वाले आदिवासियों के द्वारा क्रिसमस के अवसर पर किया जाता है। गुमला जिला के सुदुर देहातों में जलसा नृत्य क्रिसमस से कुछ दिन पहले शुरू होकर नववर्ष आने तक चलता रहता है। क्रिसमस के अवसर पर भजन गायन की भी परंपरा है जिसमें क्रिसमस की पूर्व संध्या पर युवक युवतियाँ आमने-सामने बैठते हैं और वादक दल बीच में बैठकर ढोलक, माँदर और अन्य वद्य यंत्रों का वादन करते हैं। आमने-सामने बैठे युवक-युवतियों के बीच गायन में प्रतियोगिता जैसी स्थिति निर्मित हो जाती है।

      इसके अतिरिक्त इसके अन्तर्गत शादी-विवाह नृत्य, झुमर नृत्य, जेजुटी नृत्य, बदरी नृत्य और ईटु नृत्य को रखा जा सकता है। झुमर नृत्य और गीत उराँव समुदाय के जीवन-पद्धति और धार्मिक आस्था को प्रगट करता है। बदरी नृत्य भद्रा मांस में और जेजुटी अगहन में की जाती है।

 

स्त्रियों का परिधान उरांव जनजातियों में पर्व-त्यौहारों तथा अन्य अवसरों पर मौसम के अनुसार अनेक नृत्य शैलियां हैं। नृत्य करने के दौरान महिलाओं में सजने का प्रचलन है। स्त्रियाँ की साड़ियां और बलाउज समान रंग के होते हैं। साडी का रंग सफेद और पाड़ का रंग लाल रंग में तीन धार वाली होती है। बलाउज का रंग लाल होता है। महिलाएं अपने को खोनसो, पड़िया, गतला, बेतरा, पंइरी, हंसली, बांइह कल, झुटिया छाती माला, बंधना माला, हरवा माला, चंदवा, ढेला, बिडियो, तरपत, पांची, पड़हां, सिकड़ी, लुतुर, मागरा, पंगरा, माला, खागा, बाला, बॉकी, मंदोम, हरहरि, खंड़ी आदि से सजाती है। श्रृंगार करने के लिए जवा फूल और साल वृक्ष का सफेद फूल स्त्री-पुरूष के भूरे-काले रंग को आकर्षक और सुन्दर बना देते हैं। खोनसो और झुटिया बाल में लगाया जाता था। बिड़ियो और तरपत कान में पहना जाता था। बांह में बांइहकल बांधा जाता था और ठेला एक तरह माला होता था उसे भी पहना जाता था। इनकी साड़ी को पड़िया, गतला और बेतरा कहा जाता था। स्त्रियों के ये परिधान व श्रृंगार अब विलुप्त हो रहा है।

 

पुरुषों का परिधान
नृत्य के दौरान परिधान और वाद्य यंत्रों पर विशेष ध्यान दिया जाता है। पुरुषों के परिधान में बेरा (हाथ का पंइजा (पैर का श्रृंगार) मुदरा (कान का श्रृंगार) करया, तोलोंग, धोती,लोंगी, मयूर पंख, पांची, हरहरी, लूतुर, पंगरा, मांदोली, खागा, रोडोर, घुँघरू, राली, पगा या कुखेना (सिर पर पगड़ी बांधा जाता है और पीछे की ओर गिराया जता है) शामिल है। पुरुषों के ये परिधान भी गायब हो चुके हैं। वाद्य-यंत्रों में मांदर, नगाड़ा, ढांक, ढोल, बांसुरी, डिग्गा, भेंर, नरसिंघा, शहनाई, घंटा, खोचोर, ठेचका सोयको, रटरटिया, रपका आदि का उपयोग किया जाता है।

      समय के साथ उरांव समुदाय में व्यापक बदलाव आया है। शिक्षित होने के साथ इस वर्ग ने अपनी भाषा और संस्कृति को तवज्जो नहीं दिया। स्थिति आज यह है कि करमा और सरहुल के मौकों को छोड़कर इस समुदाय का लोकनृत्य लगभग विलुप्ति के कगार पर है। इसके साथ ही वेश-भूषा और वाद्य-यंत्र भी ओझल होते जा रहे हैं। इससे उबरने के लिए इस समुदाय के नेता बुध्दिजीवी, साहित्यकार आदि ने कभी गंभीरता नहीं दिखायी। दक्षिण या पूर्वोतर भारत के लोग अपनी सांस्कृतिक-परम्परा के साथ जुड़े हुए दिखाई देते हैं। इसका एक उदाहरण यह है कि पीए संगमा की बेटी ने अपनी परम्परागत वेश-भूषा में संसद में शपथ ग्रहण किया था। दार्जिलिंग में आसीन माह में गोरखा समुदाय के लोग हर सप्ताह एक निर्धारित तिथि को पारम्परिक वेश-भूषा, गाजे-बाजे के साथ सड़कों पर जुलूस के रूप में निकलते हैं। वहां का नजारा देखते ही बनता है। इससे पर्यटक आकर्षित होते हैं और दूसरी तरफ यहां की लोक कला जीवंत हो उठती है। उराँव लोकनृत्य आदिवासी जीवन की पहचान है। इसके विलुप्त होने से यह सिर्फ किताबों में सिमट कर रह जाएगा। यह पारम्परिक धरोहर है। इसका संरक्षण संवर्ध्दन होना चाहिए।

 

 

सरियारका अनआ-रितआ गही मूँली पाँति

आदिवासी लोक संस्कृति हमारी धरोहर है, जिसे संरक्षित करना हरएक आदिवासी का परम कर्तव्य है