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प्रथम चार मिशनरियों के छोटानागपूर अगमन का 167वाँ दिवस मनाया गया

राँचीः नवम्बर 03, 2012

 

गत 2 नवम्बर 2012, दिन शुक्रवार को छोटानागपूर में प्रथम चार मिशनरियों के आगमन का 166वाँ वर्ष पूरा हुआ। गोसनर एवंजेलिकल लूथेरन चर्च तथा नोर्थ वेस्टर्न गोसनर एवंजेलिकल लूथेरन चर्च के द्वारा इस दिन को 167वाँ कलिसिया स्थापना दिवस के रूप में मनाया।

    उक्त अवसर पर जीईएल चर्च के मसीहियों ने शुक्रवार, गत 2 नवम्बर को गोसनर कम्पाउंड में वृहद कार्यक्रम आयोजित किया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सीएनआई चर्च के बिशप बीबी बास्के ने अपने उद्बोधन में कहा कि हमें आत्मिक जागृति और ईश वचन के साथ कलिसिया में नया जीवन लाने की आवश्यकता है। इस मौके पर अन्य गण्यमान्य लोगों ने भी संबोधित किया। उधर गोसनर मिडिल स्कूल मैदान में भी आनांद मेला का आयोजन किया गया। इसमें संडे स्कूल, माता मंडली तथा युवा संघ से स्टॉल लगाये गये थे। इस मेले में मसीहियों के अलावा अन्य लोगों ने भी हिस्सा लिया।

    लगभग 170 वर्ष पूर्व छोटानागपूर में आदिवासियों की स्थिति अत्यन्त दयनीय थी। आदिवासियों की जमीनें जमींदारों के द्वारा लूटी जा रही थी। जमींदारी और सामंती प्रथा चर्मोत्कर्ष पर था। बन्धुआ मजदूरी व बेगारी के कारण आदिवासी दबे जा रहे थे। ऐसी अत्याचार और प्रताड़ना से बचने के लिए कुछ आदिवासी लोग चाय बगानों तथा ईंट भट्टों में काम करने के लिए पलायन कर जाते थे। कोलकाता की सड़कों में टहलते हुए कुछ ऐसे ही आदिवासी मजदूरों पर मिशनरियों की नजरें पड़ी। और वे वहीं पर मन बना लिये कि वे उन मजदूरों के बीच जाकर अपना कार्य करेंगे। इन जर्मन ईसाई मिशनरियों का पदार्पण छोटानागपूर के राँची में 2 नवम्बर 1845 को हुआ। इसके बाद कई अन्य मिशनरियों का अगमन भी छोटानागपूर में हुआ। यह सर्वमान्य सत्य है कि उन मिशनरियों का मुख्य उद्देश्य ईसाईयत को प्रचार करना था। लेकिन आदिवासियों के इन हालतों को देखकर वे द्रवित हो उठे; आदिवासियों के उत्थान तथा जीवन हित में किये गये उनके कार्य सदैव याद किये जाएँगे। मिशनरियों ने आदिवासियों की लूटी हुई जमीन को वापस दिलाने, जमींदारों व महाजनों से बचाने, और झूठे प्रकरणों में आदिवासियों को फसाये जाने पर न्यायालीयन प्रक्रियाओं में आदिवासोयों की भरपूर मदद की। छोटानागपूर का लैण्ड टेनेन्सी एक्ट-1908 जे.बी.हॉफमैन ने तैयार किया था; जिसकी प्रासंगिकता आज भी कायम है और आदिवासियों के अस्तित्व की रक्षा के लिए सुरक्षा कवच है। मिशनरियों ने आदिवासियों के मध्य सहकारिता, एकता, आत्म सम्मान और स्व-पहचान की चेतना जगायी। फलस्वरूप आदिवासियों के बीच कई संगठनों का प्रादुर्भाव हुआ, जो बाद में विलय होकर सन् 1938 में छोटानागपूर आदिवासी महासभा के रूप में उभरा और अलग झारखण्ड राज्य की माँग यहीं से प्रारम्भ हुआ। सन् 1949 में यही संगठन रूपान्तरित होकर झारखण्ड पार्टी के नाम से एक राजनैतिक पार्टी बन गया।

    उपरोक्त चार मिशनरियों में एमिल शत्स, फ्रद्रिक वत्स, अगस्तुस ब्रांत और ई. थियोडोर यानके को बर्लिन शहर से फादर योहनेस एंवजेलिस्ता गोसनर साहब ने वर्मा देश के मेरगुई शहर में सुसमाचार का प्रचार करने के लिए भेजा था। लेकिन वहाँ के तत्कालीन समस्याओं के कारण वे भारत की ओर कूच किए और कोलकाता होते हुए छोटानागपुर पहुंच गए। 2 नवम्बर 1845 को वर्तमान बेथेसदा स्कूल के समीप जीईएल चर्च कंपाउंड के स्मारक पत्थर के पास इन मिशनरियों ने अपना शिविर डाला। इसी के साथ ही छोटानागपूर में गोसनर एवंजेलिकल लूथेरन चर्च की शुरूवात हुई। उन्होंने यहां शिक्षा के साथ स्वास्थ्य सहायता का कार्य आरंभ किया। उनके द्वारा ईसाई धर्म के प्रचार के क्रम में 25 जून, 1846 को मर्था नामक बालिका का प्रथम बार बपतिस्मा हुआ। 26 जून 1846 को लोहरदगा के भीखू उराँव और जौनी के एक पुत्र और एक पुत्री ने बपतिस्मा लिया, जिन्हें क्रमशः थॉमस और मेरी के नाम से जाना जाता है; इसी दिन अन्य तीन और बच्चों का भी बपतिस्मा हुआ। बपतिस्मा इमिल शत्स के द्वारा किया गया था। वृहद रूप में नौ जून 1850 को चार उरांव, 1851 में दो मुंडा, एक अक्टूबर 1855 को नौ बंगाली व आठ जून 1866 को दोर खड़िया सहित 10 मई 1868 हो परिवार ने जीइएल चर्च कलीसिया में बपतिस्मा लिया। इसी दौरान पहली बार प्रथम गिरजाघर के रूप में 18 नंवबर, 1851 में रांची ख्रीस्त गिरजाघर का शिलान्यास रखा गया। इन चार मिशनरियों ने काफी लंबे समय तक छोटानागपुर में सुसमाचार प्रचार किया। 10 जुलाई, 1919 में जीइएल चर्च स्वायत्त हो गया और चर्च का संचालन छोटानागपुर के भारतीय लोगों के हाथ में आ गई। प्रथम भारतीय प्रेसीडेंट पादरी हानुक दत्तो लकड़ा व सचिव पीटर हुरद बने। 12 मार्च 1977 को नोर्थ वेस्टर्न गोसनर एवंजेलिकल लूथेरन चर्च का प्रादुर्भाव हुआ। इससे पहले यह जीईएल चर्च का ही अभिन्न अंग था। वर्तमान में उपर्युक्त दोनो चर्च दो भाईयों की तरह स्वतंत्र रूप से चलते हुए आगे बढ़ रहे हैं।
 

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