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  भूटान के उराँव जनजाति

                                         

भूटान में कुँड़ुख़ बोलने वाले उराँव आदिवासी अल्पसंख्यक के तौर पर पाये जाते हैं। मुख्यतः वे द्विभाषीय हैं; एक स्थानीय भाषा और दूसरा अपनी परंपरागत कुँड़ुख़ बोलना पसंद करते हैं। भूटान में द्रविड़यन भाषा परिवार के अन्तर्गत कुँड़ुख़ ही एक मात्र भाषा विद्यमान है। उराँव लोग अपनी परंपरागत धर्म और हिन्दू धर्म को मिश्रित रूप से मानते हैं। उनका परंपरागत धर्म प्रकृति पूजा पर आधारित हैं; वे प्रकृति को रचने और उसका संचालन करने वाले महाबली धर्मेस (ईश्वर) के अस्तित्व को प्रकृति के कण-कण में पाते हैं। भूटान में भी कुछ उराँव लोग इसाई धर्म को मानते हैं। पूरे एशिया में इसाई उराँव आदिवासियों की संख्या कुल उराँव आदिवासियों की जनसंख्या का केवल 20 प्रतिशत है।

    भूटान के दक्षिण-पश्चिम सीमा पर सामत्से जिला के आसपास उराँव जनजाति के लोग पाये जाते हैं। इस इलाके में लेपचा(Lepcha) जनजाति के लोग भी पाये जाते हैं, जिनकी जनसंख्या लगभग 2,500 है। उत्तर भारत के सिक्किम और दार्जलिंग में लेपचा जनजाति के लोग बहुतायत में पाये जाते हैं। भूटान के उराँव लोगों का करीबी संबंध मुख्यतः मध्य-पूर्व भारत के उराँव बोलने वाले आदिवासियों के साथ है। भूटान में लगभग 5000 उराँव हैं, जो कुल आदिवासियों की जनसंख्या का 5% है।

     18 वर्षों तक भूटान के एक सिमेंट फेक्ट्री में कार्य कर चुके श्री इसहाक तिग्गा, खखपरता, कुम्बाटोली (लोहरदगा)  का कहना है कि वह आज से 20 वर्ष पहले अपने परिवार के साथ भूटान में रहते थे। उनके अनुसार अधिकांश उराँव परिवार छोटे-मोटे नौकरी या मजदूरी का कार्य करके जीवन-बसर करते हैं। कुछ उराँव लोग कृषि कार्य में भी रूचि लेते हैं। वहाँ परंपरागत त्यौहार सरहुल और करमा के अतिरिक्त क्रिसमस का त्यौहार भी मिलजुल कर मनाया जाता हैं।

 

पढ़िये "बंगला देश के उराँव आदिवासी"

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