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कुँड़ुख़ भाषा को संरक्षित करने हेतु कुछ महत्वपूर्ण सुझाव

  कुँड़ुख़ में यहाँ पढ़ें

 

1. सभी उराँवों को अभी से चाहे जहाँ भी रहते हों अपने-अपने घर-परिवार, संबंधितों और मित्रों से कुँड़ुख़ में बातचीत करना शुरू कर देना चाहिए। कुँड़ुख़ भाषा को अपने आने वाली पीढ़ी को उत्तराधिकार के रूप में देने के लिए न भूलें। बाहरी वातावरण के प्रभाव के कारण आजकल के बच्चे कुँड़ुख़ में बातचीत करना नहीं चाहेंगे, ऐसी परिस्थिति में समयानुसार डाँट-फटकार, सजा, दण्ड या किसी अन्य रीति से इस उद्देश्य की पूर्ति हेतू अत्याधिक प्रयास करना चाहिए।

2. हम जब कभी किसी उराँव भाई या बहनों से मिलते हैं, हर मौके और स्थान के अनुसार जितना हो सके कुँड़ुख़ में बातचीत करने का प्रयास करना चाहिए।

3. अपने उराँव लोगों के पास पत्राचार या ईमेल करते समय कुँड़ुख़ भाषा का ही इस्तेमाल करें।

4. हमें कुँड़ुख़ किताब और पत्रिकाओं को अधिक से अधिक खरीदकर पढ़ना चाहिए। अपने निवास स्थान या देश-परदेश के किसी कोणे में रहते हों कुँड़ुख़ में छपी किताबों व पत्रिकाओँ को जितना संभव हो सके संरक्षित कर प्रोत्साहित करना चाहिए।

5. हमें अवसर के अनुसार सामाजिक आन्दोलन चलाकर सरकार से यह आग्रह करना चाहिए कि विद्यालयों और विश्वविद्यालयीन पाठ्यक्रमों में कुँड़ुख़ को अधिक से अधिक शामिल करायी जाय। आवश्यकता पड़ने पर राजनीतिक दबाव भी देना चाहिए।

6. हमें स्वंय या सामाजिक रूप से आपसी आन्दोलन चलाकर हर तरह के कुँड़ुख़ पुस्तक-पुस्तिकाओं को पुस्तकालय में रखना चाहिए। पुस्तकालय के पुस्तकों को स्वंय निकालकर और अन्य लोगों को भी निकाल कर पढ़ने और जमा करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। ऐसा करने से कुँड़ुख़ पुस्तकों को महत्व मिलेगा और उसे प्रसारित करने में मदद मिलेगी।

7. बच्चों और गैर-उराँव लोगों के लिए प्राथमिक स्तर का कुँड़ुख़ पाठ की पुस्तकें प्रबुद्ध शिक्षकों के द्वारा अपने स्थान के अनुसार लिखना चाहिए। इससे बच्चों को कुँड़ुख़ पढ़ने में सहुलियत होगी।

8. सभी उराँव भाई-बहनों को अपने कार्यालय और बैंक वगैरह में हस्ताक्षर करने के लिए कुँड़ुख़ का ही इस्तेमाल करना चाहिए। कुँड़ुख़ में हस्ताक्षर करने के लिए गैर-उराँव लोगों को भी प्रोत्साहित करें।

9. कुँड़ुख़ शिक्षा क्लास के लिए दिन ठहराकर कर अपने सांस्कृतिक पहिरावा, खान-पान, कुँड़ुख़ नाम व गोत्र, कृत्रिम वस्तुओँ और प्राकृतिक वस्तुओं के नाम इत्यादि के बारे में प्रतियोगिता रखकर प्रोत्साहित करना चाहिए। कुँड़ुख़ गिनती, गीत, पाठ, गोष्ठी, श्रुतिलेख, कविता, लेख, निबंध, पहेली, व्याकरण और कहानी इत्यादि की प्रतियोगिताएँ आयोजित कर कुँड़ुख़ भाषा का प्रचार-प्रसार करना चाहिए। उराँव परम्पराओं, जीवन शैली व उनके महत्व तथा उराँव नायकों से संबंधित कुँड़ुख़ साहित्य का सृजन कर शैक्षणिक प्रोत्साहन देना चाहिए।

10. जगह-जगह पर कुँड़ुख़ बोलने, लिखने व गीत सृजन करने वालों की मण्डली बनाकर बैठक करके कुँड़ुख़ भाषा में लिखने के लिए उत्साहित करके गीत, कविता, निबंध और कहानियों की गोष्ठी, प्रतियोगिता और सम्मेलन का प्रबंध करना चाहिए।

11. समाजिक बैठकी जिसमें सभी लोग उराँव बैठे हों, कुँड़ुख़ में ही चर्चा करना चाहिए। शहरों में देखा जाता है कि हमारे लोग अपने बैठकों में हिन्दी, सादरी या अन्य भाषाओं में विचार-विमर्श करते हैं, ऐसा करना अपनी मातृभाषा को तिरस्कार कर अन्य भाषाओं को प्रोत्साहित करना है।

12. प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और आई.टी. तीनों प्रकार के मीडिया में कुँड़ुख़ का उपयोग बहुतायत से करना चाहिए। इन माध्यमों से सूचना जल्दी और ज्यादा प्रसारित होता है।

13. कुँड़ुख़ लिपि और कत्था-कहानियों की खोज करना चाहिए, ताकि हमारी भाषा लिखने, पढ़ने, समझने की दृष्टि से विकसित होकर लोगों तक पहुँच सके। कुँड़ुख़ शिक्षा क्लास में बच्चों को अधिक से अधिक भेजना चाहिए और सरकारी विद्यालयों में भी बच्चों को कुँड़ुख़ सीखने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।

14. कुँड़ुख़ और अन्य भाषा की मदद से द्वि-भाषी पुस्तकों की रचना करना चाहिए। परन्तु पढ़ाते समय अधिक से अधिक कुँड़ुख़ का ही इस्तेमाल करना चाहिए।

15. कुँड़ुख़ अख़बार, पुस्तक-पुस्तिकाओं और पत्रिकाओं का सम्पादन व मुद्रण अधिक से अधिक करना चाहिए, इसकी उपलब्धता जितनी अधिक होगी, भाषा उतना ही अधिक समृद्धि प्राप्त करेगी।

16. पूजा-पाठ, गिरजा-आराधना, धुमकुड़िया की शिक्षा, परब-त्यौहार और साँस्कृतिक प्रदर्शन के समय कुँड़ख़ बोली, गीत और नाच का ही इस्तेमाल करना चाहिए। करम त्यौहार में कथा वाचन कुँड़ुख़ में ही करना चाहिए। अखाड़ा, त्यौहार और शादी-विवाह में सभी युवक युवतियों को नाच में हिस्सा लेना चाहिए। ऐसे अवसरों पर फिल्मी, नागपूरी, सादरी तथा इस प्रकार के अन्य नाच-गान पर रोक लगनी चाहिए। नाच-गान के समय यह सुनिश्चित करना चाहिए की सभी लोगों की सहभागिता हो, इसके लिए नियम निर्धारित कर लोगों को नियंत्रित करना चाहिए।

17. अपने बाल-बच्चों, घर-परिवार, दुकान और कार्य का नाम कुँड़ुख़ में रखना चाहिए। दुकान और अपने नाम के बैनर पट्टिकाओं में लिखते समय कुँड़ुख़ और किसी एक अन्य भाषाओं का व्यवहार करना चाहिए। अपनी दुकान और व्यापारिक केन्द्र में कर्मचारी नियुक्त करते समय कुँड़ुख़ जानने वालों को प्राथमिकता देनी चाहिए।

18. कुँड़ुख़ बोलने वाले युवक-युवतियों व बच्चों को तिरिस्कार भरी निगाहों से नहीं देखना चाहिए, बल्कि उन्हें उचित आदर व सम्मान मिलना चाहिए।

19.  उराँव समाज व उनसे संबंधित निजी संगठनों के द्वारा संचालित विद्यालयों, प्रशिक्षण महाविद्यालयों, अस्पताल और संस्थाओँ में उराँव कर्मचारियों को नियुक्त करना चाहिए; और कुँड़ुख़ सिखाने के लिए अलग से कक्षाएँ संचालित की जानी चाहिए।

20. कुँड़ुख़ शिक्षा देते समय इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि बच्चों का झुकाव कुँड़ुख़ भाषा और संस्कृति की ओर आकर्षित हो; उनके मानसिक पटल पर अपनी मातृभाषा सीखने, जानने और बोलने की तीव्र लालसा उत्पन्न हो। कुँड़ुख़ भाषा उनकी शान, गौरव पहचान है, अतः उसकी महत्ता पर विशेष बल देना चाहिए।

21. कुँड़ुख़ लेखक और विद्वानों को प्रसस्ति पत्र और पुरूस्कार से सम्मानित करना चाहिए।

22. कुँड़ुख़ भाषा की विकृति दूर करने के लिए कुँड़ुख़ भाषा का व्यहार करते समय हिन्दी, अंग्रेजी, सादरी या किसी अन्य भाषा को उसके साथ शामिल नहीं करना चाहिए। तोलोङ लिपि या कुँड़ुख़ में लिखने से वह कुँड़ुख़ नहीं बन जाता। अतः कुँड़ुख़ लेखकों को यह आवश्यक है कि वे अन्य भाषाओं के शब्दों को कुँड़ुख़ के साथ शामिल न करें। अन्य भाषाओं के शब्दों को तभी इस्तेमाल करें जब किसी बात को रखने के लिए कुँड़ुख़ में कोई शब्द ही न हो।

23. अन्य भाषाओं के कुछ शब्द तथा उनके नये-नये खोजी शब्द कुँड़ुख़ में नहीं पाये जाते हैं। ऐसे शब्दों को कुँड़ुख़ में अनुवाद करना चाहिए। अनुवाद करते समय यह ध्यान देना रखना चाहिए कि कोई देश, स्थान, शहर और लोगों के नाम तो नहीं है, ऐसे एकवचन प्रदर्शित करने वाले संज्ञाओं का अनुवाद नहीं करना चाहिए। अनुवाद करते समय कुँड़ुख़ हिज्जे का ध्यान रखना चाहिए।

24. दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई, कोलकाता और बेंगलुरू जैसे बड़े महानगरों में कमाने-खाने और रोजगार में लगे लोगों को परब-त्यौहार तथा अन्य अवसरों पर अपने इष्ट-कुटुम्ब, परिवार तथा गांव-मुहल्ले के लोगों से मिलने व खुशियाँ बाँटने के लिए आते रहना चाहिए। अपने पैतृक भूमि को कभी नहीं भूलना चाहिए। ऐसा करने से कुँड़ुख़ भाषा और संस्कृति का आदान-प्रदान होगा; और उनके बीच यह कायम रह सकेगा।

25. उराँव समाज की संस्कृति में अन्य जाति-विरादरी के लोगों से शादी-विवाह करना और लड़की देने-लेने की प्रथा स्वीकार्य नहीं है। यदि कोई ऐसा करने का प्रयास करता है, तो उसे रोकने के लिए सामाजिक स्तर पर नीति निर्धारण करना चाहिए। अनेक उराँव लड़कियाँ अन्य जाति के लड़कों के पास समाज को तिरस्कार करते हुए चली गयी। ऐसी अनहोनी घटनाओं से बचने के लिए उराँव लड़के-ल़ड़कियों को अन्य जाति के लड़की-लड़कों से मेलजोल नहीं बढ़ाना चाहिए। कोई अन्य जाति का युवक जबरजस्ती किसी लड़की के पीछे पड़ता है, तो ऐसी स्थिति में समाज के लोगों को उसे संरक्षित करने के लिए आगे आना चाहिए। अन्तर-जातीय विवाह से भाषा, समाज और संस्कृति में विकृतियां उत्पन्न होती है।

26. सामाजिक कर्यकर्ताओं जैसे नर्सों, डॉक्टरों और सिस्टरों को कुँड़ुख़ सीखना चाहिए और अपनी भाषा और संस्कृति के बारे में लोगों को अवगत कराना चाहिए।

27. दक्षिण भारत के राज्यों में क्षेत्रीय भाषाओँ में कम से कम 10 टी. व्ही. चैनल प्रसारित होते हैं। कुँड़ुख़ भाषा में भी अपना निजी चैनल शुरू करना चाहिए और इसके माध्यम से कुँड़ुख़ का प्रचार-प्रसार करना चाहिए।

28. राज्य सरकारों को उराँव बहुल क्षेत्र के बच्चों को कुँड़ुख़ सिखाने के मकसद से प्राथमिक स्तर से ही पाठ्यक्रमों में कुँड़ुख़ को शामिल करना चाहिए। उसी तरीके से विश्वविद्यालयीन पाठ्यक्रमों में भी कुँड़ुख़ को सभी स्तर के पाठ्यक्रमों में शामिल किया जाना चाहिए।

29. केन्द्र व राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जो व्यक्ति अपनी आदिवासी आरक्षण का लाभ लिया हो, वह अपनी भाषा को जरूर जानें। उन शिक्षित उराँवों को जो अपनी मातृभाषा, संस्कृति और रीति-रिवाजों को नहीं जानते; उन्हें इस प्रकार का आरक्षण का लाभ नहीं दिया जाना चाहिए।

30. बड़े-बड़े शहरों में उराँवों का सामुदायिक भवन का निर्माण हो, जिसमें गाँव-मुहल्लों और किसी कार्य के लिए बाहर से आये अपने लोगों को सस्ते दर पर रहने के लिए आवास का प्रबंध हो। शहरों में उराँव होटल और ढाबा रहना चाहिए; जैसे कि करमा होटल, कुँड़ुख़ ढाबा, जिसमें उराँवों के पसन्द का खान-पान और कुँड़ुख़ गीत और बाजा बजते रहना चाहिए।

31. आजकल के सूचना प्रौद्योगिकी, इंटरनेट और वेबसाइट के युग में संपूर्ण दुनिया के उराँवों को कुँड़ुख़ संस्कृति, समाज और भाषा के बिषय में बौधिक आदान-प्रदान इन माध्यमों से करना चाहिए, तब शहरों में जन्मे और पले-बढ़े लोगों को अपनी संस्कृति, भाषा और मूल जानने का अवसर मिलेगा।

32. कम्पयुटर में लिखकर प्रिंट किया हुआ सामग्री अत्यंत मनमोहक व आकर्षक होती है, इसलिए युनिकोड आधारित कुँड़ुख़ फॉन्ट बनाने की प्रवृति को प्रोत्साहित करना चाहिए और कुँड़ुख़ भाषा में ईमेल, अनुवाद और शब्दों को सम्पादित करने का सॉफ्टवेयर विकसित करना चाहिए।

33. दक्षिणी राज्यों के क्षेत्रों में तमिल, तेलगू, कन्नड़, मलयालम और मराठी में बहुत सारे टी.व्ही. कार्यक्रम प्रसारित किये जाते हैं। कुँड़ुख़ भाषा में भी टी.व्ही. चैनल होना चाहिए। जिसके माध्यम से कुँड़ुख़ संस्कृति, नाटक, गीत, कहानी, सीरियल और सिनेमा को प्रदर्शित किया जा सके। इसी प्रकार निजी रेडियो चैनल और एफ.एम. रेडियो चैनल वगैरह भी होना चाहिए। कुँड़ुख़ भाषा में पढ़े-लिखे युवक-युवतियों को इन कार्यों को करने के लिए अवसर और रोजगार मिलना चाहिए।

34. किसी भाषा और संस्कृति को बढ़ाने और विकसित करने में उस भाषा में निर्मित फिल्म का अद्भुत योगदान होता है। अबतक कुँड़ुख़ भाषा में कोई फिल्म नहीं बनी है। फिल्म निर्माता, सम्पादक और निर्देशकों को इन कार्यों में आगे आकर इस भाषा में फिल्म का निर्माण करना चाहिए। इससे समाज के लोगों की संस्कति, भाषा और साहित्य विकसित होगी।

35. उराँव बहुल क्षेत्रों के सरकारी दफ्तरों में कुँड़ुख़ में काम करना और सूचना प्रसारण का अधिकार मिलना चाहिए, जिस प्रकार दक्षिण के राज्यों दिया गया है।

36. उराँव लोगों के मध्य कुँड़ुख़ में सोचना, बोलना, लिखना और कार्य करने की आवश्यकता है, तभी कुँड़ुख भाषा का विकास संभव है।

37. बच्चों को कुँड़ुख़ शिक्षा देते समय ऐसी सामग्रियों को शामिल करना चाहिए, जो आपसी मित्रता, भाईचारा, प्रेम, सौहार्द, एकता और सहयोग की भावना जागृत करे।

38. उपरोक्त सुझावों को प्रिंट कराकर अपन घर के दीवालों में चिपकाएँ; अथवा फोटो फ्रेम कराकर वैसे जगहों में टाँगे जहाँ पर लोगों की नजरें अधिक पड़ें, और लोग ज्यादा पढ़ सकें।

 

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