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आदिवासी अस्तित्व और भूमि सुरक्षा व्यवस्था

 

भारत विभिन्नताओं और विषमताओं से भरा एक देश है। जहाँ कई जाति, धर्म, वर्ग और भाषा के लोग निवास करते हैं। सभों को अपनी संस्कृति के आधार पर सामाजिक रीति रिवाज और कयदे कानून हैं। अलग-अलग जातियों का विचारधारा और जीवन के प्रति दृष्टिकोण भी बिलकुल भिन्न हैं। जमीन की उपयोगिता, हस्तांतरण के तरीके और उतराधिकार का प्रथा भी अलग-अलग हैं। कोई जमीन और प्रकृति को अपनी संपत्ति समझ कर उसका उपभोग करता है, कोई अपनी परिवेश और पर्यावरण के साथ खिलवाड़ करता है। कुछ लोग हमारे देश में ऐसे भी हैं जो जमीन, जंगल, पर्वत, नदी, नाले और जो कुछ संसार में हैं, उन सब चीजों को अपने जीवन का एक हिस्सा मानते हैं। यह जमीन उनकी निजी संपत्ति नहीं है, जीवन का एक अंश है, उनका अस्तित्व और अस्मिता इस धरती से जुड़ा है। अतः वे इस धरती में जो कुछ है, सब के रखवाले हैं। वे प्रकृति और जमीन का उपभोग नहीं करते, अपने जीवन यापन के लिए उसका उपयोग करते हैं, प्रकृति और जीवन एक दूसरे के पूरक हैं, द्योतक नहीं। यह एक पवित्र रिश्ता है, एक सनातन और शाशवत संबंध। जहाँ यह समझ में खोट आ जाता है, प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता है, प्रकृति और जीव-जंतू एक दूसरे का शत्रु बन जाता है।

प्रकृति और धरती के प्रति उपर्युक्त दोनों दृष्टिकोण इस संसार में फैले दो वर्गों की है। प्रथम दृष्टिकोण इस विश्व में फैले वो बहुसंख्यक वर्ग के हैं जो इस पृथ्वी को, उसमें जो कुछ भी है, सब को अपना गुलाम बनाकर प्रतियोगिता और प्रतिस्पर्धा पर आधारित एक ऐसा बाजारू समाज को जन्म दिया, जिसका अंत पूरे मानव राशी के अंत से होगा।  आज इस पृथ्वी पर आ पड़े विश्व तापीकरण जैसे विपदा इस प्रकार के विकृत मनोवृतियों का सपष्ट उदाहरण है। प्रथम पद के लोग एक दूसरे से आगे निकलना चाहते हैं। वे एक दूसरे को पछाड़ना चाहते हैं, वे हर कीमत पर सर्वाधिक उत्पादन चाहते हैं ताकि वह हर संभव ऐश आराम के साथ जी सकें। भविष्य और आने वाली पीढ़ियों का उनको कोई परवाह नहीं।

द्वितीय दृष्टिकोण इस विश्व और हमारे देश के कोणे-कोणे में फैले उन तमाम आदिवासी भाई-बहनों की है जो धरती आबा के संतान होने पर गर्व करते हैं। वह अपनी आप को प्रकृति के अंश मानते हैं, अपना उद्भभव इस प्रकृति के किसी न किसी वस्तु या जीव से जोड़ कर देखते हैं और बहुवर्ग के लोग उन्हें टोटामिस्ट या सीधे आदिवासी कहते हैं।

       आज उत्तर और दक्षिण अमेरिकी महाद्वीपों में गोरे वर्ग के लोगों का कब्जा है। वे आज वहाँ बहुसंख्यक वर्ग हैं। लेकिन एक जमाने में अमेरिकी महाद्वीप इनका और माया जैसे महान सभ्यताओं और विशाल देशों पर राज्य कर रहे महान सम्राटों से भरे थे। वे जमीन और प्रकृति से जुड़े एक महानतम् संस्कृति और सभ्यता को संजोये हुए थे। लेकिन यूरोप से प्रवास कर रहे तथाकथित उन्नत सभ्यता के लोग वहाँ के स्थानीय और मूल सभ्यता को इस भाँति मिटा दिया कि आज उस सभ्यता की सुधी लेने वाले ही नहीं के बराबर रह गये हैं।

अमेरिका महादेश में कब्जा जमाने के लिए यूरोपिय सैनिक अभियान चला रहे थे। कई मूल संस्कृतियाँ उजाड़े जा चुके थे, लोगों को बर्बरता पूर्वक मार दिये जा रहे थे। ऐसा ही एक अभियान में एक सेना प्रमुख की मुठभेंड़ एक आदिवासी मुख्या से हो जाता है और सैनिक अधिकारी इस पराजित मुख्या से कहता है, हे पराजित और मेरे गुलाम मुख्या आज तुम पराजित और विवश हो कर मेरे सामने खड़ा है। आज से यह जमीन, पहाड़, जंगल, नदी नाले सब कुछ मेरी माता है, मेरी जननी, इनके द्वारा मेरा जन्म हुआ, इन्होंने मुझे पाला-पोशा, अतः मैं इनका रखवाला पुत्र हूँ, इनका संरक्षण करना मेरा धर्म है। मेरा जन्म जन्मांत का रिश्ता इन चीजों से जुड़ा हुआ है यो दोनों विश्व को दो वर्गों के प्रतिनिधि हैं। काश इन धरती पुत्रों का प्रकृति के प्रति जो मनोभाव और दृष्टिकोण है उसे बहुसंख्यक लोग समझ पाते और अनुभव कर पाते यह जमीन और पर्यावरण आज हमारी जननी होती और हम उनके संरक्षण में खड़े पसंदिदा पुत्र।

भारत में भी यही हुआ और लगातार यही हो रहा है। बहुवर्ग के ये लोग न जाने कितने सदियों से भूमिपुत्रों की भावनाओं को अपने पैरों तले रौंदते जा रहे हैं। अगर लोग समझदारी के साथ काम नहीं करें या समय रहते चेतना में नहीं आये तो छोटानागपूर जैसे प्रांतो में भी यहाँ के भूमि-पुत्रों का अस्तित्व अमेरिका की भाँति मिट जायेगा। क्योंकि छोटानागपूर के इतिहास में एक ऐसा समय था जब यहाँ सिर्फ आदिवासी खुशहाली के साथ निवास करते थे। बाहर से लोग जटिल सभ्यतायें और कुटिल मानसिकताओं के साथ यहाँ प्रवेश किये, यहाँ के लोगों के मनोभावनाओं और विशाल ह्रदयता का शोषण करते हुए उनका जमीन लूटा, जंगल काट कर जीविकोपार्जन की खोज में अपना ही जोत कोड़ कर आबाद किये गये जमीन सें बन्धुआ मजदूरी करने के लिए विवश कर दिये गये। बहुत से लोग जुल्म सहते-सहते असम और बंगाल भाग गये। वस्तु स्थिति को देखते हुए तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने आदिवासियों की जमीन की रक्षा के लिए 1908 में छोटानागपूर काश्तकारी अधिनियम बनाये। लेकिन इस कानून के रहते हुए भी इस इलाके के भूमि-पुत्रों का जमीन, जंगल, पहाड़ और खनिजों पर बाहरी तत्व धड़ाल्ले से कब्जा जमा रहे हैं। अतः  प्रत्येक व्यक्ति को छोटानागपूर काश्तकारी अधिनियम का समझ होना अत्यंत आवश्यक है ताकि उसके प्रावधानों का उपयोग करके अपने पुरखों की अमानत, जहाँ उनके नाम का पत्थर गड़ा है, उसे सुरक्षित रख सकें।

आज के युग में कितने ही आदिवासियों के जमीनों को भू-माफियाओं के द्वारा गलत तरीके से कौड़ी के मोल खरीदकर उसे ऊँचे दामों में बड़े-बड़े कम्पनियों अथवा बड़े अधिकारियों को बेच दिया जाता है। इस कार्य को अन्जाम देने में सरकारी अधिकारी अथवा नेतागण भी शामिल रहते हैं, ताकि मोटी कमिशन प्राप्त किया जा सके। ऐसे कार्य में संल्गन व्यक्ति बहुत ही चालाकी से आदिवासियों के जमीनों को हथियाने में कामयाब हो जाते हैं। राँची जैसे शहरों के कई इलाकों में आदिवासी जमीन को दलाल और अधिकारियों की साँठ-गाँठ से सामान्य जमीन बना कर बेच दिया जाता है। यदि ऐसा संभव नहीं हो पाया तो किसी भोले भाले आदिवासी को मोहरा बना कर उसके नाम से जमीन क्रय कर लिया जाता है, उसके बाद उसी आदिवासी के द्वारा ऊँची कीमतों पर विक्रय कराया जाता है, और उस भोले आदिवासी को कमिशन के तौर पर बहुत मामूली रकम दी जाती है। शहरों में एक जमीन को कई आदमियों के हाथ रजिस्ट्री कर देना एक आम बात हो गई है। सरकार के द्वारा भी विकास योजनाओं के नाम पर कई गाँवों के कई एकड़ जमीन से लोगों को विस्थापित कर दी जाती है।

 

 छोटानागपूर के आदिवासियों की पारम्पारिक भूमि वयवस्था

सेवानिवृत अपर जिला उपायुक्त श्री सुरिन के अनुसार छोटानागपूर के प्रथम मूल निवासी असुर और होड़ो समुदाय के आदिवासी थे। होड़ो समुदाय के अन्तर्गत मुंडा, हो और संताल आते हैं, जिनकी कई शाखाएँ, जैसे- बिरहोर, भुंइहर-मुंडा, नगेसिया, भुमिज, कोड़ा, कोरवा, खड़िया, बिरजिया आदि। होड़ो समुदाय के छोटानागपूर में बसने के लगभग सौ साल बाद उराँव जनजाति के लोग भी इन होड़ो समुदाय के आस-पड़ोस में बस गए और आपस में घुल मिल गए। होड़ो परिवार और कुँड़ुख़ परिवार के लोग जंगल, नदी, पहाड़ आदि को समतल करके खेती करने योग्य जमीन बनाई, गांव बसाए और घर भी बनाएँ और उनके मालिक कहलाए। इस प्रकार गांव बसाने वाले ऐसे होड़ो परिवार तथा कुँड़ुख़ परिवार और उनके वंशजों को क्रमशः खूंटकट्टीदार और भुंइयरदार कहलाए। उस समय इन आदिवासी समाज और गांव में कोई राजा-महाराजा नहीं होते थे, इसलिए ये आदिवासी स्वयं ही अपनी जमीन के मालिक थे। ये किसी को मालगुजारी नहीं देते थे। इन आदिवासियों की व्यवस्था में मानकी और पड़हा-राजा होते थे। और उनमें से प्रत्येक के इलाके को पट्टी या पीड़ कहा जाता था। मानकी या पड़हा-राजा का चुनाव सार्वसम्मति से होता था अथवा योग्य पुत्र होने पर उत्तराधिकारी के रूप में उन्हें ही यह पद सौंपा जाता था। प्रत्येक गांव में पाहन और मुंडा बनाये जाते थे, खूंटकट्टी या भुंइहरी खूंट परिवार के लोग ही होते थे। पाहन अथवा दिहुरि गांव के लोगों के लिए पूजा-पाठ का काम करते थे और मुंडा गांव के प्रशासन और विधि व्यवस्था आदि बनाए रखने के लिए उत्तरदायी होता था और आज भी है। मुंडा किसी निरंकुश शासक की तरह नहीं बल्कि गांव के सभी वयस्कों की राय-मशविरा के अनुसार कार्य करता है और इसी प्रकार मानकी और पड़हा-राजा भी अपने क्षेत्र में प्रशासन और विधि-व्यवस्था बनाए  रखने के लिए जिम्मेदार हैं। इस प्रकार छोटानागपूर के प्रत्येक आदिवासी गांव एक ग्राम-गणराज्य हुआ करता था। आदिवासी गांव की जमीन खूंटकट्टी या भूंइहरी परिवार की संयुक्त स्वामित्व की सम्पत्ति होती थी और है, जिसका संरक्षक और प्रतिनिधि मुंडा अथवा गांव का प्रधान होता है। भू-सम्पत्ति किसी व्यक्ति विशेष की निजी संपत्ति नही हुआ करती थी; आज भी खूंटकट्टी और भुंइहरी गांवों की भू-सम्पत्ति का स्वामित्व इसी व्यवस्था के अनुरूप है।

       गांव के प्रत्येक गणराज्य में आदिवासी मूल के सभी निवासी बहुत सुखी थे, उनके बीच कोई वर्ग भेद नहीं था; पूरे गांव के लोग मिलकर सहयोगी जीवन बिताते थे, एक साथ मिलकर काम करते थे, शिकार करते थे, खाते-पीते थे, प्रत्येक परिवार के सुख-दुःख में भागीदार होते थे। लेकिन जमींदारों के आने के बाद उनका युगों से चला आ रहा हक और सुख बड़ी बर्बरता और छल से लूट लिया गया और आज वे रैयत, दर-रैयत, सिकमी रैयत, गैर-कायमी-रैयत तथा भूमिहीन श्रमिक की श्रेणी में उतार दिये गए हैं। परन्तु कुछ मुंडारी खूंटकट्टी और भुंइहरी गांव और परिवार के लोग अभी तक अपना पुराना हक सुरक्षित और बरकरार रखने में सफल रहे हैं।

   

आदिवासियों के अस्तित्व, भू-संरक्षण एवं सर्वांगीण विकास हेतू भारत के संविधान में किए गए प्रावधान - 

आदिवासियों के सर्वांगीण विकास के लिए भारत के जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा जुलाई 2006 में "राष्ट्रीय जनजातीय नीति" बनाई गई है. वर्ष 1947 में भारत के स्वतंत्रता पश्चात भारत के लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था चलाने के लिए संविधान का निर्माण किया गया, जिसे 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया. संविधान में कुल 22 भाग, 12 अनुसूची एवं 395 अनुच्छेद हैं. इनमे से सर्वाधिक अनुच्छेद- अनुसूचित जनजातियों (आदिवासियों) के हित संरक्षण के लिए हैं, जिनमे निम्न मुख्य हैं :-

() अनुच्छेद 366 में - अनुसूचित जनजातियों को परिभाषित किया गया है.

() अनुच्छेद 342 में - पूरे भारत के प्रत्येक राज्य में निवासरत आदिवासी (अनुसूचित जनजाति) जातियों की सूची घोषित किया गया है.

() अनुच्छेद 244(1) में - अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन एवं नियंत्रण के बारे में उपबंध हैं.

() अनुच्छेद 244(1)5 - में अनुसूचित क्षेत्रों को लागू विधि (क़ानून) का स्पष्ट प्रावधान है अर्थात इन क्षेत्रों में भूमि का अंतरण और आवंटन, बैंकिंग सिस्टम, शान्ति एवं प्रशासन इत्यादि संबंधी प्रशासनिक कार्य गैर आदिवासी क्षेत्रों से अलग होगा.

() अनुच्छेद 244(1) - अंतर्गत 73 वाँ संविधान संशोधन द्वारा पांचवी अनुसूची पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम 1996 पेशा क़ानून के तहत अनुसूचित क्षेत्रों के अंतर्गत आने वाले सभी ग्राम पंचायतों के सरपंच पद एवं जनपद/जिला पंचायतों के अध्यक्ष पद तथा उक्त पंचायतों के कुल 50 प्रतिशत से अधिक पंच/जनपद सदस्य/जिला पंचायत सदस्य के लिए आरक्षित हैं. इसी प्रकार अनुसूचित क्षेत्रों में लागू अन्य क़ानून जैसे- कृषि उपज मंडी/को-आपरेटिव एक्ट, जल उपभोक्ता संस्था एक्ट, वन प्रबंधन समिति एक्ट, स्थानीय स्वशासन (नगर पंचायत/नगर पालिका परिषद/नगरपालिक निगम एक्ट) में भी आरक्षण लागू होना चाहिए.

() अनुच्छेद 14 में समता के अधिकार के तहत जनजातीय समाज को न्याय दिलाने के लिए विशेष प्रावधान हैं जैसे- अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 में शोषण के विरुद्ध संरक्षण के विशेष प्रावधान हैं.

() अनुच्छेद 14(4) में - अनुसूचित जनजातियों के साथ धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव नहीं करने का प्रावधान हैं तथा इनके उन्नति के लिए विशेष उपबंध (आरक्षण) बनाने का प्रावधान हैं.

() अनुच्छेद 16(4) में - अनुसूचित जनजातियों के लिए शासकीय नौकरियों एवं पदों में जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण देने का प्रावधान है.

() अनुच्छेद 23 में - मानव का व्यापार, जबरन काम कराना इत्यादि शोषण के विरुद्ध रक्षा का प्रावधान है.

(१०) अनुच्छेद 275 में - अनुसूचित जनजातियों के कल्याण तथा अनुसूचित क्षेत्रों के विकास के लिए भारत की संचित निधि से राज्य सरकार को अनुदान राशि देने का प्रावधान है.

(११) अनुच्छेद 330 में - विधान सभा एवं 332 में - लोकसभा में अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण का प्रावधान है.

  

छत्तीसगढ़ के आदिवासियों की हित एवं भूमि सुरक्षा वयवस्था

छत्तीसगढ़ को-आपरेटिव सोसायटी एक्ट 1960 की धारा-48() के कंडिका 2() अनुसार "किसी सोसायटी में जहां सदस्यों कि कुल संख्या के कम से कम आधे सदस्य अनुसूचित जनजातियों के हैं, वहाँ ऐसा प्रतिनिधि केवल जनजातियों के सदस्यों में से होगा."

छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की जमीन पर दूसरे वर्ग के लोगों के द्वारा खरीद बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध है। छत्तीसगढ़ में उद्योगों द्वारा निजी भूमि खरीदे जाने पर भू-राजस्व संहिता की धारा 165(6) अनुसार जमीन कंपनी के नाम अंतरित की जाती है और पुनर्वास नीति के तहत प्रति एकड़ 3 लाख या उससे भी अधिक(जमीन की स्थिति अनुसार) कीमत अदा करनी पड़ती है। भू-राज्सव संहिता की धारा 170(ख) के अनुसार अनुसूचित क्षेत्र एवं अनुसूचित जनजातियें की भूमि को गैर आदिवासी द्वारा अंतरण नहीं किया जा सकता अर्थात आदिवासियों से छलपूर्वक भूमि खरीद-विक्री या भू-अर्जन नहीं किया जा सकता। अतः इस प्रकार की अनियमितता पाये जाने पर इस नियम के तहत मूल भू-स्वामी को भूमि वापस दिलाये जाने का भी प्रावधान है।

 

छोटानागपूर काश्तकारी अधिनियम, 1908

यह अधिनियम तत्कालीन अंग्रेज सरकार द्वारा पारित जमीन संबंधी कानून है जिसके द्वारा आदिवासियों के जमीन को गैर-आदिवासियों के हाथ हस्तांतरित होने से बचाता है। जमीन की खरीद-बिक्री पर नियंत्रण रखता है और कानून में गलत तरीके से हस्तांतरित जमीन को वापस करने का भी प्रावधान है। यह कानून छोटानागपूर टेनेंसी एक्ट या सी.एन.टी. एक्ट के नाम से जाना जाता है। यह कानून 11 नवंबर 1908 को सरकार द्वारा प्रभावी तरीके से लागू किया गया। रैयत और जमीन के प्रकार, कश्तकारों और भूधृतियों की श्रेणी जमीन्दारों(आज के तारीख में सरकार) और काश्तकारों के बीच का संबंध, लगान, भूमी का हस्तांतरण और जमीन पर अधिकार इत्यादि विषयों पर स्पष्ट परिभाषा और मार्गदर्शन देता है। यह कानून छोटानागपूर के जनजातियों के जमीन का संरक्षक की भूमिका निभाता है। समय समय पर इसमें संशोधन लाकर माँग को ध्यान में रखकर परिवर्तन भी लाये गये हैं।  वर्तमान में दक्षिणी छोटानागपूर के सभी नगरपालिकाये, अधिसूचित क्षेत्रों तथा कन्टोंनमेंटो को इस कानून के अन्तर्गत लाया गया है। अतः आज यह कानून ग्रामीण और शहरी क्षेत्र में समान रूप से लागू है। इस प्रकार यह अधिनियम छोटानागपूर के आदिवासियों के अस्तित्व की रक्षा का कानून है।

 

सी.एन.टी.एक्ट की प्रासंगिकता

आज  झारखण्ड में आदिवासियों से कई गुणा अधिक गैर-आदिवासी बसे हुए हैं, उनमें अधिकांश के पास अपने घर हैं। एक समय ऐसा था, जब छोटानागपूर में आदिवासियों के अलावे कोई नहीं रहते थे। यहाँ के तमाम जमीन, जंगल, पर्वत, नदी, नाले पर उनका हक था। फिर इतने लोग कहाँ से आये। एक जमाने में पूरे कोल्हान के मालिक जिन्होंने इस भूखण्ड को जोत-कोड़ कर आबाद किया, वे आज इपने ही इलाके में गरीबों में गरीब कैसे हो गये? जीविका की खोज में वे आज महानगरों में पलायन कर रहे हैं, ईट-भट्ठों में भटकने के लिए मजबूर कैसे हो गये? महानगरों में दो लाख से अधिक आदिवासी बालायें दायी का काम करती हैं और मालिकों के शोषण का शिकार हो रहीं हैं। भुखण्ड का कच्चा माल उपयोग करके हजारों छोटे बड़े उद्योग धंधे फुल-फल रहे हैं। बड़े-बड़े उदयोगों, विकास परियोजनाओं और राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर लाखों भूमि-पुत्रों को अपने जमीन और पर्यावरण से बेदखल किया गया है और आज भी यह काम जारी है। उनको विकास और उन्नति का स्वपन दिखाया जाता है, जो कभी साकार नहीं होंगे। गरीब आदिवासी अपने जमीन और सांस्कृतिक विरासत से विस्थापित होकर कालांतर में जाने कहाँ गुम हो जाते हैं।

झारखण्ड अलग राज्य बनने के बाद कई नेताओं, समाजिक शुभचिन्तकों और बुद्धिजीवियों ने यह सवाल उठाया था कि भारत जैसे एक गणतंत्र देश में जहाँ हर एक नागरिक को समाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार , अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वातंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समानता, भारत में कहीं पर भी अबाध विचरण करने और बस जाने की छूट संविधान द्वारा दिया गया हो तो क्यों सी.एन.टी.एक्ट जैसे कानून समाज में अलगाव और वर्गीकरण पैदा करेगा?  कुछ बड़े-बड़े नेता तो सी.एन.टी.एक्ट के औचित्य पर ही सवाल उठा देते हैं। बड़े कद के एक आदिवासी नेता ने तो यहीँ तक बोल डाला कि सी.एन.टी.एक्ट के ऐसे धारोओं को निरस्त कर देना चाहिए जिसके कारण आदिवासी अपने जमीन को उचित दाम में बेच नहीं पाते। उनके अनुसार इस कानून के चलते अगर कोई आदिवासी छात्र अपना जमीन बेचकर या गिरवी रख कर पढ़ने के लिए विदेश जाना चाहता है तो जा नहीं सकता। कुछ नेताओं के अनुसार सी.एन.टी.एक्ट की कुछ धाराएँ विकास के मार्ग में सब से बड़ा रोड़ा है।

लेकिन कोई भी छोटानागपूर के भूमि-पुत्रोंम का शुभ-चिन्तक, उनके साथ सदियों से होता आ रहा अन्याय और अत्याचार पर गौर करने के बाद ऐसा राय नहीं रखेगा, न कि बहस के नाम पर भी सी.एन.टी.एक्ट का औचित्य पर कोई सवाल खड़ा करेगा। इतिहास का पन्ना पलटने से यकीन हो जाएगा कि अगर सी.एन.टी.एक्ट या एस.पी.टी.एक्ट नहीं होते तो अब तक छोटानागपूर के आदिवासियों के पास कोई भी जमीन बचा नहीं रहता। नेता, ठेकेदार, दलाल और बड़े-बड़े अधिकारी चाहे वो कोई भी जात या वर्ग का क्यों नहीं हो, वे एक अलग दर्जा हैं, उनके पास पैसों की कमी नहीं रहती। वे अपने राजनीतिक और आर्थिक लाभ के लिए किसी का भी राग आलापने से पीछे नहीं रहते। जितने भी अत्याचार या अन्याय किये जाते हैं, भुक्तभोगी तो साधारण जनता ही होती है। जो गरीब और बेबस है, उन पर दुःखों का पहाड़ टूट पड़ता है।

       अतः झारखण्ड एक अलग राज्य बनने के बाद यह कानून और भी महत्वपूर्ण और अहम हो गया है। झारखण्ड अलग राज्य की लड़ाई आदिवासियों का विकास और उन्नति के लिए लड़ा गया। झारखण्ड अलग राज्य आदिवासियों के नाम से बना। अगर उनकी जमीन की रक्षा नहीं किया जायेगा तो वे इस राज्य में स्वंय समाप्त हो जायेंगे। आज झारखण्ड के बड़े शहरों में भारी माक्षा में बाहरी लोग और गैर आदिवासी आकर बस रहे हैं और यह सोना और हीरा नागपूर हर प्रकार के प्राकृतिक और खनिज संपादाओं से भरा हुआ है। लेकिन यहाँ के मूलनिवासियों को अपना हक नहीं देना चाहते। पूँजीपतियों का उद्देश्य सिर्फ मुनाफा कमाना है, पर्यावरण और संस्कृतिक विरासत का सामाजिक विनाश और असुंतलन से उनको कोई लेनादेना नहीं है। इस काम में राजनीतिक और पूँजीवादी ताकतें अनुसूचित जनजाति के प्रभावशाली नेताओं का भी खुल कर इस्तेमाल करते हैं। वे अपने मनसूबों में कामयाब होने के लिए जात, धर्म, भाषा और संस्कृति जैसे हथियारों का भी प्रयोग करते हैं। धार्मिक आस्थाओं का बहस छेड़ कर वे आदिवासी सामज को तोड़ना चाहते हैं। ताकि आदिवासी आपस में उलझते रहें और वास्तविक मुद्दों से उनका ध्यान हट जायें। प्रथम दृष्टया ऐसी ताकतें समाज में न्याय, समानता और विकास की बातें करते हुए दिखाई पड़ते हैं, लेकिन उनकी सुनियोजित, दूरगामी योजनायें आदिवासी अस्मिता को कुछ ही दशकों में एक शुन्याता की ओर ले जायेंगे।

आज छोटानागपूर में एक प्रकार के अघोषित संस्कृतिक युद्ध चल रहा है। यहाँ की मूल संस्कृति असमंजस में खड़ी दिखाई दे रही है। विभिन्न माध्यमों से यहाँ के मूल निवासियों के दिमाग में यह भर दिया जा रहा है कि उनकी संस्कृति और भाषा से श्रेष्ठ दूसरी संस्कृति और भाषाएँ हैं। वास्तव में वो वो नही कोई और है। समाज में प्रतिष्ठा और पहचान पाने के लिए उनको अपने पहचान भूल कर दूसरा एक पहचान को अपनाना होगा। दूसरा एक धर्म, दूसरी एक भाषा और दूसरे एक संस्कृति को अपनाना होगा। यह कितना बड़ा विंडम्बना और विरोधाभास की बात होगी अगर कोई पहचान पाने के लिए अपना पहचान मिटा दें, अस्तित्व पाने के लिए अपना ही अस्तित्व को मिटा दें। कई जगहों में तो वह अपनी ही संस्कृति को पूरी तरह भूल गये हैं, अपने नाम के आगे अपना आदिवासी टाइटल तक नहीं लगाते हैं। आज  कुछ जातियाँ आदिवासी दर्जा पुनः प्राप्त करने के लिए आन्दोलन चला रहे हैं। उनका कहना यह है कि हम पहले आदिवासी थे, 1932 के आस-पास हम आदिवासी संस्कृति को छोड़ दिये थे। अब हमें अपनी गलती महसुस हो गई। हमें फिर से आदिवासी का दर्जा दिया जाय।

शायद आदिवासियों के साथ कालांतर में हुई घटनायें बाहरी जमीन्दार, ठेकेदार और दलालों के द्वारा किये गये अमानवीय व्यवहार उन्हें अपने बारे में नकारात्मक सोचने पर मजबूर कर दिये हो। हकिकत तो यह है कि छोटानागपूर में जीवन बसर कर रहे विभिन्न आदिवासी समूहों के बीच में हजारों सालों से प्रचलित समानता, और संसाधनों पर सामुदायिक स्वमित्व और सदस्यों के बीच में संसाधनों का समान और जरूरत पर आधारित वितरण प्रणाली जैसी परम्परायें और परिपाटयाँ उन्हें विश्व के आज तक के महानतम् संस्कृतियों में लाकर खड़ा करते हैं। इस प्रकार के विचार धारायें सिर्फ किताबों में देखने को मिलती है। यहाँ तक बड़े-बड़े साम्यवादी और गणतंत्रात्मक आधुनिक शासन प्रणालियों में भी वास्तविकता के धरातल में कार्यान्वित कर देखा नहीं गया। आदिवासी परंपरा में कोई छोटे या बड़े नहीं होते थे। यहाँ तक अपने घर के धांगर भी घर के एक सदस्य के रूप में ही गिना जाता था। गाँव का मुंडा, महतो या दूसरे कोई पदाधिकारी कभी किसी पर अपना पद का रौब नहीं जानते थे। विभिन्न आदिवासी भाषाएँ शब्दों  के इतने घनी और पौराणिक हैं कि विश्व की कई भाषाएँ इन भाषाओं से शब्द उधार लेकर अपनी भाषाओं को समृद्ध किये।

यह एक परिवर्तन का समय है और यहाँ हर एक समूह को अपना पहचान और अस्मिता को कायम रखते हुए आधुनिकता और चका-चौंध की इस दुनियाँ में आगे बढ़ना है। विबिन्न मुद्दों पर सोच समझ कर आगे बढ़ना है। प्रत्येक व्यक्ति और समूह को व्यक्तिगत निर्णय लेकर फैसला करना है। अगर कोई सोचे कि कोई नेता या समाज सुधारक या बुद्धिजीवी आप के अस्तित्व को बचाने के लिए बात कर रहा है, आप के लिए सोच रहा है तो यह आज के महौल में एक बहुत बड़ी भूल होगी। अनुसूचित जनजाति के कुछ सदस्य राजनीति, बड़ी नौकरियाँ और उद्योग धंधे कर के अवश्य समाज में प्रतिष्ठित हो गये हैं। लेकिन वे वहाँ प्रतिष्ठित होने के बाद उनकी भाषा ही बदल जाती है। वे अपने गरीब भाई-बहनों के बचाव मे आगे कहाँ आ पाते हैँ? अपनी अस्तित्व को बचाने की लड़ाई आज आम जनता को लड़ना है। आम आदमी को सोचने औएर अपने लिए निर्णय लेने के लिए सीखना है। यहाँ आदिवासियत को बचाने और बनाये रखने के लिए आम लोगों को जागरूक होकर दलगत, जातिगत और धर्मगत भावनाओं से ऊपर उठकर सोचने की जरूरत है।

आधुनिकता और भूमण्डलीकरण के इस दौर में हर एक समाज जटिल से जटिलतम होता जा रहा है। समाजित मानयताओं और मानुषिक मुल्यों के साथ समझौते किए जा रहे हैं। लोगों का सोच और प्रवृतियाँ विकृत होता जा रहा है। कुछ लोग यह लड़ाई हर कीमत पर जिन्दा रहने के लिए बड़ रहे हैं, तो कुछ लोग एक से आगे निकलने के लिए लड़ रहे हैं। यह पूरे विश्व की समस्या है। अपने अस्तित्व को बचाने के लिए जरूरत से ज्यादा राजनैतिक दलों, नेताओं, सरकारों और संगठनों पर निर्भर रहने से काम नीं चलेगा। क्योंकि सभी कोई अपना एजेंडा लेकर चलते हैं। यह लड़ाई प्रत्येक व्यक्ति, परिवार और समूह को उत्तम स्तर के नैतिक मूल्यों और समाजिक जीवन मूल्यों को अपना कर लड़ना है। यह लड़ाई तभी संभव हो सकती है जब आप को खुद विश्वास ह जाय कि आप का अस्तित्व खतरे में है।

       सरकार के बड़े बड़े परियोजनाओं से कई लाख आदिवासी अपने मूल निवास से विस्थापित हुए हैं। वे परियोजनाओं के शुरू होने से पहले अच्छे खासे किसान थे, जमीन से विस्थापित हो जाने के बाद उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि वे करे तो क्या करें, जायें तो कहाँ जायें। वे अपने पुरखों की भूमि से बेदखल किये गये थे। बड़ी मेहनत से वह उस जमीन को जोत कोड़ कर आबाद किये थे। उनके जीवन और आत्मा वह जमीन थी। एक ही वार में उनको काट कर उसे अलग कर दिये गये थे। कुछ पैसे हाथ में थे, कुछ लोग कहीं-कहीं कुछ जमीन खरीद कर बस गये और बाकी लोग पैसे के समाप्त होने पर ईंट भट्ठों, महानगरों में कमाने गये। उनके गाँव बिखर गये, परिवार बिखर गये और वे स्वयं बेबसी के अन्धकार में गुम हो गये।

आज ऐसे कुछ परियोजनाओं के विरूद्ध कई समाज सेवी संगठन स्थानिय लोगों को जागरूक कर आन्दोलन कर रहे हैं। हमें भी उनके साथ देने की जरूरत है। आज मित्तल और जिंदल जैसे बड़े-बड़े उद्योगपति छोटानागपूर में निवेश कर भारी मात्रा में मुनाफा कमाना चाहते हैं। नेता और दलाल साँठ-गाँठ कर के वे आगे बढ़ने के लिए हर संभव कोशिश कर रहे हैं। आगर वे अपने मनसूबों मे कामयाब हो जायेंगे तो और कई हजार एकड़ जमीन छीने जायेंगे, और कई हजार आदिवासी मूलवासी परिवार बेघर हो जायेंगे। कुछ लोगों को छोटी मोटी नौकरियों में रख लिये जायेंगे। अधिकांश लोग बर्बाद हो जायेंगे।

Tolong Siki Script

Kurukh script, which is called "Tologn Siki" has been developed and produced for public use after a long time hard work and research by the Kurukh scholars. 'Tolong Siki', means 'Tied Sound'.         Read more...

Language Protection Tips

Language is the base of any society cultural, economical and social development of the society. Kurukh language is our identification, who represents our society as well as our people. Hence, it is our responsibility to protect and develop for next generation.       Read more...

Know Oroan People of the world

India is the primary country, where Oroans are  residing, but now they are found in other countries, such as Bhutan, Nepal, Bangladesh, USA, Australia, England, Marisus etc.           Read more...

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